Saturday, July 31, 2010

मुद्दतों से दिल में एक कसक सी है
आज इन आँखों को तुझे देखने की ललक सी है
सोचा था हमने जी लेंगे हम ऐसे ही
पर आज तुझसे एक मुलाकात की तड़प सी है

आज चांदनी रात में तुम मुझसे मिलने आ जाओ
दिल में जितनी बातें हैं सारी हमसे कह जाओ
फिर भी लबों को कहना कुछ न कहें
आँखों को आँखों से करने देना सारी बातें

अरसों से तुम को दिल में छुपाये बैठे हैं
तुझसे बिछड़ने के गम को सीने से लगाये बैठे हैं
फिर भी आज ये दर्द दबाये नहीं दबता
आँखों का एक भी अश्क रोके नहीं रुकता

बस एक बार के लिए तुम फिर से मिलने आ जाओ
बरसों तक फिर जीने की मन को हिम्मत दे जाओ
फिर न कभी बोलूगी फिर न कभी टोकूगी
जीवन के इस दर्द को हँसते हुए सह लूंगी









Friday, July 30, 2010

आंसू न बहाना आँख से कि बादल बरस जायेगे
तुझे रोता हुआ देख कर वो भी तड़प जायेंगे
आंसू न बहाना आँख से बादल बरस जायेंगे

जो बीता हुआ कल है वो अपना नहीं
फिर क्यों कल की यादों में जीना
आने वाले कल के सपने सजा लो
बना लो उन्हें अपनी आँखों का गहना

ये अश्क नहीं हैं मोती हैं
इन्हें यूँ ज़ाया न कर
तेरा मन सुन्दर चितवन है
उसे ऐसे दुखाया न कर

बौछारें बहुत गिर पड़ी इस ज़मीन पर
नदियाँ सैलाब बन गयी हैं
अभी अभी तो थमे हैं बादल थोड़े
आंसू न बहाना आँख से फिर बादल बरस जायेंगे






आज एक ऐसा ज़ख्म दिया तुमने जो कभी भर नहीं सकता
कुछ ऐसा कह गए तुम जो मन से मिट नहीं सकता
तुम कर न सके वफ़ा हमसे एक पल की भी
और अब ये दिल तुम्हारी इबादत में झुक नहीं सकता

Thursday, July 29, 2010

ये ढलता हुआ सूरज एक पैगाम दे रहा है
कि फिर एक रात को तुमसे जुदा हूँ मैं
चाँद कि चंचल मादकता में डूबी हुई है दुनिया सारी
फिर भी सुन ऐ चांदनी आज तुझसे खफा हूँ मैं

आज फिर एक दिन गुज़र गया तेरी बाहों में
और फिर कटेगी एक रात तेरी यादों में
फिर निकल जाएगी रात दूरियों की शिकायतों में
मन्नतें अनेक करनी हैं की आ जाओ तुम फिर ख्वाबों में

काश बस में होता कि वक़्त को थाम लेती मैं
तुम्हारी बाहों में समां कर सूरज को टोक देती मैं
नहीं ढलने देती दिन कि जब तुम होते मेरे पास
चाँद भी समझ जाता मेरी कही इतनी बात
कि कुछ नहीं वो भी जो चांदनी न हो उसके पास

मैं जानता हूँ की जिस हवा के झोंके ने मुझे छुआ है अभी अभी
उसने तुम्हे भी ज़रूर छुआ होगा,
ये चाँद की नरम ठंडक तुम्हारे गालों को अपना बिस्तर बना क बैठी होगी
ये बारिश की हलकी हलकी बूंदे, तुम्हारे बालों पर ओस की बूँद की तरह स्थिर होंगी
ये रात की कालिमा तुम्हारी आँखों की चमक से हार कर कहीं कोने में जा दुबकी होगी
ये क्या महक है तुम्हारी साँसों की, कि रात रानी के फूल भी शर्मा के खिल उठे हैं

देखो कहीं सो  न जाना, रात बहुत मुश्किल से जागी है आज  ||




Wednesday, July 28, 2010

मुझको क्या पता था कल तक क्या भूल रही थी मैं,
तन्हाइयों के साथ रहती, ख़ामोशी से बातें करती,
अपने ही मन के झूले झूल रही थी मैं,
क्या पाता था कल तक मुझको की कुछ भूल रही थी मैं |

फिर जाने कैसे एक दिन तुम राह में चले आये,
मदमस्त हवा के झोके में फूलों की खुशबू भर लाये,
सूना सा था जो आँचल कल तक
वो खुशियों से महकाया
कल तक था जो उजड़ा
उस बाग़ को फिर लहराया

तुम न आते फिर भी ये सांसें रूकती नहीं चलती
पर जीवन जीना क्या होता है शायद कभी नहीं समझती
समझा होगा खुदा ने मेरी ज़िन्दगी में इस कमी को
तभी तो न जाने तुम्हारी किस राह से ला जोड़ा मेरी इस राह को ||

Tuesday, July 27, 2010

अक्सर सोचा करती हूँ अकेले में
कि क्या ज़िन्दगी इसी का नाम है
जो पास है वो अपना नहीं और जो दूर है वो उससे ताल्लुकात नहीं
क्यों अपना कोई अपना नहीं रहता और जो दूर है उसका आसरा नहीं रहता

चंचलता ऐसी की पानी के जैसी
ज़िन्दगी का कोई एक रास्ता नहीं होता
पग-पग बिखरती पग-पग संभलती
पल में ठहरती पल में बदलती
शायद जीना भी इसी का ही नाम होता

Monday, July 26, 2010



क्या समझोगे तुम मेरी तन्हाई को
जिसकी हर कदम पे सारी दुनिया परछाई हो
इक तुम्हारी कमी के कारण भीड़ में भी तनहा रहती हूँ
तुम जो हो नहीं तो तुम्हारी यादों से ही अपने दर्द कहती हूँ


कभी फुर्सत मिले इस जहाँ से 
तो इस ओर भी देख लेना तुम
जब सूरज ढल जायेगा और पर्छैयाँ घुल जाएगी
तब तुम्हारा हाथ थामने मैं ही नज़र आऊँगी
बरसों से तुमने हमे पुकारा नहीं
शायद नाम हमारा तुमको अब गवारा नहीं|
पसंद आ गया कोई और नाम तुम्हे
या रहा हमारा ही नाम अब उतना प्यारा नहीं||
मेरे ख्वाब में जो एक शख्स आता जाता है
वो तुमसे मिलता जुलता है
जो हर रात मुझे जगा जाता है
तुमसे ही मिलता चेहरा है

डूबी रहती हूँ सोच में मैं
कि तुम सच हो या मेरे दिल कि कोई तस्वीर
हाथ बड़ा कर छूना चाहूं 
तो पल में हो जाते हो गुम

पहले तो कभी इस एहसास का एहसास न था
ज़िन्दगी में मुहब्बत का कोई नाम न था
कब तक ख्वाबों में ही मिलने आओगे
अब ज़िन्दगी में भी चले आओ

Sunday, July 25, 2010

हर गुज़रते पल के साथ
तुम ये दावा करते हो कि मैं हूँ
मेरी हर टूटी उम्मीद पर
तुम वादा करते जाते हो कि मैं हूँ

कहाँ रह जाते हो तुम मगर
जब दिल को तुम्हारे साथ की ज़रूरत होती है
इन आँखों को किसी के एहसास की ज़रूरत होती है
तुम क्यों नज़र नहीं आते
जब ये खालीपन मुझे और भी वीरान कर जाता है
जिस वक़्त मुझे तुम्हारे सिवा कोई और नहीं समझ पाता

ऐसे वादे मत किया करो
जो निभाना न आये
मेरी मुरझाई हुई ज़िन्दगी को बेजान कर जाये
मैं ये एहसास करती हूँ
जब मुझे तुम्हारी सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है
तब तुम्हे पूरी दुनिया की फ़िक्र होती है

शायद किसी दिन मैं भी तुम बिन जीना सीख लूं
बिना शिकायत साँसे लेकर ज़िन्दगी जी भी लूं
पर क्या वो खुशबू वापस आ पायेगी
उड़े हुए रंगों पर क्या बहार छा पायेगी????