Wednesday, July 28, 2010

मुझको क्या पता था कल तक क्या भूल रही थी मैं,
तन्हाइयों के साथ रहती, ख़ामोशी से बातें करती,
अपने ही मन के झूले झूल रही थी मैं,
क्या पाता था कल तक मुझको की कुछ भूल रही थी मैं |

फिर जाने कैसे एक दिन तुम राह में चले आये,
मदमस्त हवा के झोके में फूलों की खुशबू भर लाये,
सूना सा था जो आँचल कल तक
वो खुशियों से महकाया
कल तक था जो उजड़ा
उस बाग़ को फिर लहराया

तुम न आते फिर भी ये सांसें रूकती नहीं चलती
पर जीवन जीना क्या होता है शायद कभी नहीं समझती
समझा होगा खुदा ने मेरी ज़िन्दगी में इस कमी को
तभी तो न जाने तुम्हारी किस राह से ला जोड़ा मेरी इस राह को ||

Tuesday, July 27, 2010

अक्सर सोचा करती हूँ अकेले में
कि क्या ज़िन्दगी इसी का नाम है
जो पास है वो अपना नहीं और जो दूर है वो उससे ताल्लुकात नहीं
क्यों अपना कोई अपना नहीं रहता और जो दूर है उसका आसरा नहीं रहता

चंचलता ऐसी की पानी के जैसी
ज़िन्दगी का कोई एक रास्ता नहीं होता
पग-पग बिखरती पग-पग संभलती
पल में ठहरती पल में बदलती
शायद जीना भी इसी का ही नाम होता

Monday, July 26, 2010



क्या समझोगे तुम मेरी तन्हाई को
जिसकी हर कदम पे सारी दुनिया परछाई हो
इक तुम्हारी कमी के कारण भीड़ में भी तनहा रहती हूँ
तुम जो हो नहीं तो तुम्हारी यादों से ही अपने दर्द कहती हूँ


कभी फुर्सत मिले इस जहाँ से 
तो इस ओर भी देख लेना तुम
जब सूरज ढल जायेगा और पर्छैयाँ घुल जाएगी
तब तुम्हारा हाथ थामने मैं ही नज़र आऊँगी
बरसों से तुमने हमे पुकारा नहीं
शायद नाम हमारा तुमको अब गवारा नहीं|
पसंद आ गया कोई और नाम तुम्हे
या रहा हमारा ही नाम अब उतना प्यारा नहीं||
मेरे ख्वाब में जो एक शख्स आता जाता है
वो तुमसे मिलता जुलता है
जो हर रात मुझे जगा जाता है
तुमसे ही मिलता चेहरा है

डूबी रहती हूँ सोच में मैं
कि तुम सच हो या मेरे दिल कि कोई तस्वीर
हाथ बड़ा कर छूना चाहूं 
तो पल में हो जाते हो गुम

पहले तो कभी इस एहसास का एहसास न था
ज़िन्दगी में मुहब्बत का कोई नाम न था
कब तक ख्वाबों में ही मिलने आओगे
अब ज़िन्दगी में भी चले आओ

Sunday, July 25, 2010

हर गुज़रते पल के साथ
तुम ये दावा करते हो कि मैं हूँ
मेरी हर टूटी उम्मीद पर
तुम वादा करते जाते हो कि मैं हूँ

कहाँ रह जाते हो तुम मगर
जब दिल को तुम्हारे साथ की ज़रूरत होती है
इन आँखों को किसी के एहसास की ज़रूरत होती है
तुम क्यों नज़र नहीं आते
जब ये खालीपन मुझे और भी वीरान कर जाता है
जिस वक़्त मुझे तुम्हारे सिवा कोई और नहीं समझ पाता

ऐसे वादे मत किया करो
जो निभाना न आये
मेरी मुरझाई हुई ज़िन्दगी को बेजान कर जाये
मैं ये एहसास करती हूँ
जब मुझे तुम्हारी सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है
तब तुम्हे पूरी दुनिया की फ़िक्र होती है

शायद किसी दिन मैं भी तुम बिन जीना सीख लूं
बिना शिकायत साँसे लेकर ज़िन्दगी जी भी लूं
पर क्या वो खुशबू वापस आ पायेगी
उड़े हुए रंगों पर क्या बहार छा पायेगी????

Saturday, April 3, 2010

सबसे करीब हो कर भी सबसे दूर है
पास हो कर भी कितनी मजबूर है
मन करता है तुझसे बात करूँ मैं
अपने दुःख दर्द कहूँ मैं
पर तू तो सिर्फ दिन दिन की साथी है
अँधेरे तले छुप जाती है
शायद ज़िन्दगी का दस्तूर है ये
इनमे परछाइयों का क्या कसूर है||