Monday, December 12, 2011

दिल में जो हल्का दर्द उठा है
वो तुम्हे भी है मुझे भी
आंसू जो किसी बात पर छलके हैं
वो तेरे भी हैं मेरे भी

बात एक होठों पर पर आ ठहर गयी है
वो सुनी तू ने भी है मैंने भी
अनजान से इस रिश्ते को न जाने क्या कहते हैं
यही सवाल तेरे ज़हन में है मेरे भी

भूल सकती नहीं वो रात कभी
जब दिल पहली बार इस तरह धड़का था
खामोश से समंदर को जैसे
चांदनी रात की लहरों ने आ जकड़ा था

आँखें जो मुस्कुराती हैं मेरी
वो तेरी होठों की मुस्कान का आइना है
तेरी ख़ुशी से है हर ख़ुशी मेरी
कहते हैं मोहब्बत जिसे तुझे भी है मुझे भी

Tuesday, December 6, 2011

राहों में अकेले खड़े यूँ ही
महसूस इसी बात को करती हूँ
तन्हा भले दिखती नहीं मैं
पर तन्हाइयों में सिमटी खड़ी हूँ

तेरा साथ न होने से आज
मैं तिनकों सी बिखरी पड़ी हूँ
कुछ कहती नहीं कभी किसी से
पर तेरे नाम से जीती हूँ

तुमसे करी थी जो बातें
तितली के रंगों जैसी लगती हैं
तुमसे रूठ कर गुज़ारे लम्हे
अँधेरी रातों जैसे लगते हैं

शिकवे भी हैं तुमसे, शिकायतें भी
हज़ारों आंसू देने की तकलीफें भी
फिर भी क्यों खलता है दिल को खालीपन
क्यों लगता है तुझ से अब भी ये अपनापन

यादें भी तुमसे हैं, हंसी भी
प्यार करने की हर ख़ुशी भी
पर क्यों अपनी मोहब्बत अधूरी सी है
तेरे मेरे बीच क्यों मीलों की दूरी सी है

Monday, August 29, 2011

बातों ही बातों में फिर वही बात हो गयी
फिर वही तार छिड़े हैं, फिर वही रात हो गयी

तन्हाइयों में बिखरी ये खामोशियाँ तेरी
मेरे इस दिल को बेचैन कर जाती हैं

अब भी कई सवाल हैं कहे अनकहे
तेरे जवाबों का इंतज़ार है दिल को

कहते तो तुम भी हो गुनाह नहीं है ये
क्यों फिर मुझे झूठी तसल्ली देते रहते हो

पुरानी बातें कुछ भूल जाने को कहते हो
क्यों कुछ बातें आज भी जीना चाहते हो


सब जानते थे तुम की तन्हा थी मैं ज़िन्दगी में
क्यों फिर तुम भी मुझे तन्हा कर चले गए

आज तुम हो भी नहीं भी हो ज़िन्दगी में
दो पल साथ चल मीलों दूर चले जाते हो

जीवन मेरा उथल पुथल करती लहरों सामान है

ये लहरें जिसे ढूँढती हैं वो शांत किनारा हो तुम



Thursday, August 25, 2011

अनजाने ही कोई चला आया ज़िन्दगी में
हर सवाल का फिर वो जवाब बन गया

यूँ तो देखे थे कई सपने मैं जागते सोते  
जाने कैसे वो ख्वाब सबसे ख़ास बन गया

मुझ तक ही सिमटी थी मेरी ये दुनिया सारी
एक अजनबी कैसे हमदम इस बार बन गया

भीड़ में चलते हुए तन्हाइयों में गुम हो जाती हूँ 
तन्हाइयों में रहकर भी उसको पास पाती हूँ

खुद में ही डूबे रहने का दिल करता है मेरा
मैं ही मेरी पक्की सहेली हो चली हूँ

लब्ज़ में क्या बयान करूँ मेरे दिल का हाल 
धड़कनों को धड़कनों से जुड़ने का अरमान मगर है   











Tuesday, August 23, 2011

हर गुज़रता लम्हा अब मुद्दतों सा जान पड़ता है
तुम्हारे आने का इंतज़ार कुछ इस कदर है दिल को

नहीं मालूम मुझे कौन है ज़्यादा पागल
धड़कन, जो इस ख्याल पर ही नाच उठी है
मौसम, जो इस बात के ज़िक्र पर खिल उठा है
मैं, जो आईने के सामने शरमाई सी आ बैठी हूँ

कैसे कहें तुम्हे सबसे ज़्यादा चाहते हैं हम
अब तो इस घर की हवाएं भी यही दावा करती हैं
इस चादर की सलवटें भी मेरी ही तरह तुम्हारी दीवानी हैं
तुम्हे एक बार और छू लेने का ख्वाब ये भी दिन रात देखती हैं

घर के हर कोने में तुम्हारी यादें बसी हैं
जो तन्हा गुज़ारी हैं सदियाँ यहाँ हमने 
तेरे साथ गुज़ारे लम्हों से वो बड़ी नहीं हैं
बस उन्ही चंद लम्हों के नाम करी है ये ज़िन्दगी


Monday, August 22, 2011

आज कुछ अजब सा है मन मेरा
थोड़ी कशिश थोड़ी बेचैनी भी है
लाखों अरमान जगे हैं दिल में
फिर भी कुछ कमी सी है

यहाँ अगर है लाल आकाश
तो वहां काली बदरा छाई है
मगर सावन की ठंडी हवा
तेरे गालों को सहलाकर मेरे गालों तक आई है

जो बाल तुम्हारे माथे को चूम रहे हैं
तो मेरे हाथों का ही वो इशारा है
जो पास नहीं हूँ मैं आज तेरे
तो हवाओं को ये खेल खिलाया है

अभी अभी एक पंख उड़कर आया कहीं से
क्यों लगता है तुमने सारा प्यार लुटाया है
मुझे छू कर गुज़री हवा तुम तक जब आएगी
मेरी बाहों के घेरे का एहसास करा जाएगी

नहीं समझ आता कितने फासले हैं नज़दीकी कितनी
दूर इतने जितना दूर है हमसे आकाश
या पास इतने जितना तुझे छूकर
मुझ तक आती ये ठंडी हवा