Thursday, August 25, 2011

अनजाने ही कोई चला आया ज़िन्दगी में
हर सवाल का फिर वो जवाब बन गया

यूँ तो देखे थे कई सपने मैं जागते सोते  
जाने कैसे वो ख्वाब सबसे ख़ास बन गया

मुझ तक ही सिमटी थी मेरी ये दुनिया सारी
एक अजनबी कैसे हमदम इस बार बन गया

भीड़ में चलते हुए तन्हाइयों में गुम हो जाती हूँ 
तन्हाइयों में रहकर भी उसको पास पाती हूँ

खुद में ही डूबे रहने का दिल करता है मेरा
मैं ही मेरी पक्की सहेली हो चली हूँ

लब्ज़ में क्या बयान करूँ मेरे दिल का हाल 
धड़कनों को धड़कनों से जुड़ने का अरमान मगर है   











2 comments:

  1. i loved these line भीड़ में चलते हुए तन्हाइयों में गुम हो जाती हूँ, तन्हाइयों में रहकर भी उसको पास पाती हूँ

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  2. nice..wish u had written more :) just felt the need to read more after the last line

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